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0 Sourav Pradhan

 सालों से चला आ रहा यह विवाद एक भयंकर युद्ध में तब बदल गया जब चाइना ने 20 अक्टूबर 1962 को अचानक भारत पर एक बड़ा हमला कर दिया। भारत अचानक से हुए इस हमले के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। इसका नतीजा यह हुआ कि चीन ने कई मोर्चों पर भारत को पीछे धकेल दिया और महज 4 दिनों के अंदर कई अहम इलाकों पर कब्जा कर लिया। इस दौरान चीन का ध्यान लद्दाख के ईस्ट में मौजूद चिशूल पर भी था जो स्ट्रेटेजिकली बेहद अहम इलाका था। यहां भारत की एक एयर स्ट्रिप मौजूद थी जो युद्ध के समय सैनिकों और हथियारों की आवाजाही के लिए बेहद जरूरी थी। चिशूल के इस एयर स्ट्रिप की सुरक्षा के लिए रेजांगला एक बेहद की डिफेंस पॉइंट था। रेजांग ला वो पहाड़ी दर्रा है जो लगभग 17000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। अगर चीन समय से रेजांग ला पर अपना कंट्रोल कर लेता तो उसका केवल चुशूल की एस ट्रिप पर ही नहीं बल्कि इस पूरे सेक्टर पर दबदबा हो जाता। चाइना की इसी संभावित योजना को भांपते हुए भारत ने 24 अक्टूबर 1962 को मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व में 13 कुमाऊं रेजीमेंट की चार्ली कंपनी की एक टुकड़ी को चुशूल एयर स्ट्रिप की रक्षा के लिए रेज़ान ला भेजा। इस टुकड़ी के ज्यादातर जवान हरियाणा से थे और वह अपनी जिंदगी में इतनी ठंड और बर्फबारी का एक्सपीरियंस पहली बार कर रहे थे। यहां टेंपरेचर -30° तक चला जाता था। इसलिए ठंड इतनी ज्यादा थी कि कच्ची सब्जियां और फल बाहर निकालने पर कुछ पल में ही जमकर पत्थर बन जाते थे। इस ठिटुरन भरी ठंड में चढ़ाई कर रहे भारतीय जवानों के दांत से दांत बज रहे थे और सांस छोड़ते हुए उन्हें ऐसा महसूस होता था जैसे नाक से निकलती हवा भी जम जा रही हो। परेशानी सिर्फ इतनी नहीं थी। इन जवानों को एक शॉर्ट नोटिस पर जम्मू एंड कश्मीर के बारामूला से रेजांग ला भेज दिया गया था। लेकिन उनके पास ना तो एक्सट्रीम कोल्ड के लिए प्रॉपर गर्म कपड़े थे और ना ही कोई स्पेशल बूट्स थे। रेजांग ला की सिचुएशन इतनी जटिल थी कि यहां आसपास इस्टैब्लिश इंडियन आर्टिलरी और रेजांग लॉ के बीच एक ऊंची पहाड़ी मौजूद थी। जिस वजह से युद्ध के दौरान यहां आर्टिलरी सपोर्ट मिल पाना और रीइंफोर्समेंट भेज पाना काफी मुश्किल था। ऐसे हालात में भी भारतीय सैनिकों के पास दुश्मन का मुकाबला करने के लिए पुरानी और आउटडेटेड 0.33 राइफल्स थी। जिन्हें हर बार फायर करने के बाद दोबारा मैनुअली रीलोड करना पड़ता था। इन राइफल्स के अलावा उनके पास केवल नौ लाइट मशीन गंस, 32 इंच मोटर्स, दो-3 इंच मोटर्स और 500 हैंड ग्रेनेड्स थे। वहीं दूसरी ओर चाइनीस सोल्जर्स के पास भारत से कई गुना एडवांस 7.62 सेल्फ लोडिंग राइफल्स थी। साथ ही मीडियम मशीन गंस, 120 एमएम मोटार्स, 132 एमएम रॉकेट्स और रिकइल लेस राइफल्स जैसी ताकतवर वेपनरी थी। रेजांगला पहुंचने के बाद मेजर शैतान सिंह ने अपने 120 जवानों को तीन प्लटूंस में बांट दिया। 35 सोल्जर्स वाली प्लटून सेवन नॉर्थ के फॉरवर्ड स्लोप पर नायब सूबेदार सुरजाम की अगुवाई में तैनात की गई। 40 सोल्जर्स की प्लेटून एट सदर्न एरिया में नायब सूबेदार हरिराम के नेतृत्व में मोर्चा संभाली थी और 40 सोल्जर्स वाली प्लेटून नाइन प्लेटून से के साउथ वेस्ट में कैप्टन रामचंद्र यादव के नेतृत्व में तैनात की गई। इन तीनों प्लेटून्स को लीड करने के लिए एक सेंट्रल कमांड पोस्ट बनाई गई। जहां खुद मेजर शैतान सिंह तैनात थे। इस कमांड पोस्ट के करीब 150 यारार्ड्स पीछे मोटार्स टीम को इस्टैब्लिश किया गया। जिसे नायक राम कुमार लीड कर रहे थे। 2. 13 कुमाऊं रेजीमेंट के इन जवानों के लिए इन बर्फीली पहाड़ियों में बिना खास गर्म कपड़ों और बिना अच्छे खाने के हर दिन गुजारना भी एक युद्ध लड़ने जैसा ही था। इंडो चाइना वॉर को शुरू हुए कई हफ्ते बीत चुके थे और दूसरे मोर्चों पर घमासान जारी था। लेकिन रेजांग लॉ में अभी तक चाइना की तरफ से कोई सीधी कारवाई नहीं हुई थी। मेजर शैतान सिंह हर रोज सभी प्लटूंस का दौरा करते और जवानों को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने के लिए प्रेरित करते। इस दौरान दूसरे मोर्चों से आ रही युद्ध की खबरें यह जवान ऑल इंडिया रेडियो पर सुना करते थे। जैसे ही किसी मोर्चे पर चाइना के भारी पड़ने की खबर मिलती 13 कुमाओं के जवानों का खून खौल जाता। वो इसकी चर्चा अपने कमांडर मेजर शैतान सिंह से करते हुए कहते साहब जब हमें युद्ध का मौका मिलेगा तो हम जमकर लड़ेंगे। इस पर मेजर शैतान सिंह केवल मुस्कुरा देते। इसके बाद 17 नवंबर की रात यहां एक बर्फीला तूफान आया। उस तूफान के बाद फिजाओं में एक अजीब सी खामोशी थी। लेकिन इसी खामोशी में हजारों चीनी घुसपैठिए भी लगातार भारतीय सैनिकों के करीब बढ़ते जा रहे थे। अभी अगली सुबह का उजाला हुआ भी नहीं था कि चाइना की तरफ से कुछ हलचल शुरू हो गई। तीनों प्लेटून के जवानों ने जब अपने बैनोकुलस से नजरें दौड़ाई तो उन्हें कुछ किलोमीटर की दूरी पर चाइना की ओर से एडवांस वेपन और जवानों से खचाखच भरी 32 सैन्य गाड़ियां तेजी से रेजांग ला की ओर आती दिखी। जब तक भारतीय सैनिक कुछ समझ पाते, उससे पहले ही सुबह के 3:30 बजे चीन की तरफ से एक लंबा बॉस्ट आया जिसकी गूंज से पूरा पहाड़ी इलाका कांप उठा। मेजर शैतान सिंह को तुरंत बताया गया कि प्लेटून एट के सामने से दुश्मन का हैवी फायर आया है। ठीक 4 मिनट बाद नायब सूबेदार हरिराम ने भी उन्हें अपनी पोस्ट से रेडियो पर खबर दी कि करीब 30 चीनी सिपाही हमारी तरफ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इसके बाद मेजर शैतान सिंह ने अपने सभी जवानों को पोजीशन लेकर गोली चलाने का आदेश दे दिया। जैसे ही चाइनीस सोल्जर्स भारतीय जवानों की फायरिंग रेंज में आए, उन्होंने बिना देर किए उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दी। केवल 10 मिनट की गोलीबारी में कई चीनी सैनिक मारे गए और कई डर कर पीछे भाग गए। सबको लग रहा था कि पहला खतरा टल गया है। लेकिन असल में यह एक बड़े हमले से पहले की खामोशी थी। भारतीय जवान थोड़े रिलैक्स हुए ही थे कि तभी चाइना की तरफ से सीधा भारतीय पोस्ट के एक 3 इंच मोटार पर एक जोरदार बस्ट हुआ। एक ही झटके में मोटार तहस-नहस हो गया और तीन भारतीय जवान इसकी चपेट में आकर अपनी जान गवा बैठे। अपने तीन साथियों की शहादत की खबर ने मेजर शैतान सिंह को झकझोर कर रख दिया। उन्हें जल्द ही स्थिति का अंदाजा हो गया कि दुश्मन भारी मात्रा में एडवांस वेपंस के साथ आया है। उन्होंने तुरंत अपने सीनियर ऑफिसर को एक रेडियो मैसेज भेजा। प्लेजांग ला पर चीन की सेना हमला कर चुकी है। हमें तुरंत रीइंफोर्समेंट की जरूरत है। उनके इस संदेश पर दूसरी तरफ से जवाब आया इस वक्त रीइंफोर्समेंट मुमकिन नहीं है और आगे भी हम कोई मदद नहीं भेज पाएंगे। इसलिए बेहतर होगा आप अपने जवानों के साथ पोस्ट छोड़कर पीछे हट जाए। यानी इस मौके पर अगर मेजर शैतान सिंह चाहते तो वह अपनी और अपने जवानों की जान बचाने के लिए पोस्ट छोड़कर भाग सकते थे। लेकिन मेजर शैतान सिंह की रगों में देश प्रेम और बहादुरी का वो लहू दौड़ता था जिसे रणभूमि में पीठ दिखाना मंजूर नहीं था। सीनियर ऑफिसर्स के आदेश के बाद भी उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक देश की रक्षा करने का फैसला किया। उन्होंने अपने सभी जवानों को एक जगह पर इकट्ठा किया और उनसे कहा, हम केवल 120 हैं। हमें दुश्मनों की सही संख्या मालूम नहीं है। लेकिन हो सकता है वह हजारों में हो। युद्ध में हमारे गोला बारूद कम पड़ सकते हैं। आगे हमें कोई मदद भी नहीं पहुंचाई जाएगी। इसलिए आप में से जो कोई भी अपनी जान बचाना चाहता है, वह पीछे हट सकता है। लेकिन मैं अपनी आखिरी सांस तक ही रहकर दुश्मन का मुकाबला करूंगा। अपने कमांडर की इस बात पर वहां मौजूद सभी भारतीय जवानों ने एक साथ जोश भरे स्वर में कहा, "साह, हम मर जाएंगे, लेकिन यह पोस्ट नहीं छोड़ेंगे।" मेजर शैतान सिंह को अपने साथी जवानों की इस बहादुरी पर गर्व था। इसके बाद उन्होंने चीन की सेना का ढंग से मुकाबला करने के लिए स्ट्रेटजी बनाई। गोलियों और हथगोले की कमी को देखते हुए यह तय हुआ कि हर गोली तभी चलाई जाएगी जब उससे किसी चीनी सैनिक का मरना कंफर्म हो। और जैसे ही कोई चीनी सैनिक मारा जाए तुरंत उसके हथियार छीन लिए जाए ताकि गोला बारूद की कमी पूरी की जा सके। उधर चीन को लग रहा था कि उसके पहले हमले और यहां उसके सैन्य बल को देखते हुए इंडियन सोल्जर्स अब तक पोस्ट छोड़कर भाग चुके होंगे। लेकिन चीनी सैनिकों को कहां पता था कि आज उनका सामना मेजर शैतान सिंह और उनके जांबाजों से होने वाला है जो अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर सकते हैं लेकिन जीते जी उन्हें उनकी पोस्ट से 1 इंच भी पीछे हटा पाना नामुमकिन है। 18 नवंबर की सुबह 4:00 बजे चाइना ने फिर से एक हमला किया। इस बार हमला प्लटून से की पोजीशन पर हुआ था। मेजर शैतान सिंह को जब इसकी खबर मिली तो उन्होंने आदेश दिया कि जैसे ही चीन सैनिक उनकी फायरिंग रेंज में आ जाए उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग की जाए। इसके बाद जैसे ही चीनी सैनिक 300 गज की रेंज में आए भारतीय जवानों ने उन पर धुआंधार फायरिंग शुरू कर दी। कुछ ही देर में वहां दुश्मन की लाशें बिछ गई और एक बार फिर से कुछ ही मिनटों में दुश्मन को उल्टे पांव पीछे लौटना पड़ा। इस जीत से प्लटून से में खुशी का माहौल था। उन्होंने मेजर शैतान सिंह तक यह खबर पहुंचाई। सर दुश्मन की ओर से फायरिंग शांत हो चुकी है और हम इस बार भी जीत चुके हैं। लेकिन मेजर शैतान सिंह दुश्मन की रणनीतियों को भांप चुके थे। उन्होंने तुरंत अपने जवानों को सतर्क करते हुए कहा युद्ध को खत्म मत समझो वो फिर आएंगे। उनका अनुमान कुछ ही देर में सच साबित हुआ और सुबह के 4:55 पर चीन की तरफ से एक और बड़ी हलचल शुरू हो गई। प्लेटून से नायब सूबेदार सुरजाराम ने फिर से मेजर शैतान सिंह को संदेश भेजा।

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