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0 Sourav Pradhan

 10. इसके बाद 10 फरवरी 1963 को इंडियन आर्मी का एक जांच दल ब्रिगेडियर टीएन रायना के नेतृत्व में रेड क्रॉस के रिप्रेजेंटेटिव्स के साथ रेजांगला पहुंचा। बर्फ से ढकी उन पहाड़ियों में जहां कभी बंकर और मोर्चे थे, वहां अब सिर्फ वीरता की खामोश गवाही बची थी। चीनी गोलाबारी से तबाह हो चुके मोर्चों के पास बिखरे रेत के बोरे, गोलियों और बमों के टुकड़े और हर तरफ युद्ध की तबाही का मंजर था। कुछ सैनिकों के शव, गोलियों और छर्रों से छलनी होकर अब भी वहां वैसे के वैसे पड़े थे। उनके हाथों में अब भी उनकी राइफलें थी, ग्रेनेड थे जैसे मरते दम तक वह लड़ते रहे हो। नर्सिंग असिस्टेंट धर्मपाल दैया के हाथ में अब भी पट्टी और मॉर्फिन की सिरिंज थी। उन्होंने अपनी जान एक घायल साथी की जान बचाते हुए गवाई थी। किसी भी जवान की पीठ पर गोली नहीं लगी थी और हर एक ने सीने पर गोली खाई थी जिससे साफ पता चल रहा था कि उनमें से किसी ने भी भागने की कोशिश नहीं की थी। मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर अब भी एक बड़े पत्थर के सहारे वैसा ही टिका हुआ था जैसा उनके साथी कैप्टन रामचंद्र छोड़कर गए थे। उनके पैरों में अब भी रस्सियों से बंधी एलएमजी थी और उंगली ट्रिगर पर अब भी वैसी की वैसी जमी हुई थी। जब ब्रिगेडियर टीएन रैना ने यह सब अपनी आंखों से देखा तो वह अपने आंसू रोक नहीं सके। उन्हें और उनके साथ मौजूद जवानों को यह गिल्ट भी खाए जा रहा था कि उन्होंने क्यों 3 महीने तक अपने इन शहीद साथियों की तलाश नहीं की। 13 फरवरी तक 114 में से कुल 97 जवानों के शव मिल सके। कुछ जवानों के हाथों से उनके हथियार तक नहीं निकाले जा सके क्योंकि वह इतनी मजबूती से उन्हें थामे हुए थे कि उनकी उंगलियां काटनी पड़ी। 96 सैनिकों का वही अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया। ब्रिगेडियर टीएन रैना ने खुद अपने हाथों से इन सभी सैनिकों के शवों को सामूहिक चिता की अग्नि दी। इस मार्मिक दृश्य को देखकर वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आंखों में आंसू थे और वह उनकी वीरता को याद कर रहे थे। मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए उनके जोधपुर स्थित घर भेजा गया। भारतीय सेना के इतिहास में यह पहली बार हुआ था जब किसी शहीद का शरीर घर भेजा गया था। 9. इस बैटल के केवल 3 दिन बाद चाइना ने सीजफायर की भी घोषणा कर दी और दोनों देशों के बीच एक महीने से चला आ रहा लंबा युद्ध भारत की हार के साथ समाप्त हो गया। रेजांग लॉ बैटल को इंडियन मिलिट्री हिस्ट्री की सबसे भयंकर लड़ाईयों में से एक माना जाता है। जहां एक इलाके की रक्षा करते हुए लगभग सभी जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन वीरों के बलिदान को देश ने लंबे समय तक अनदेखा किया। 120 में से जो पांच सैनिक लौट कर आ गए थे। उन्होंने बटालियन हेड क्वार्टर में अपने सीनियर ऑफिसर्स को युद्ध की पूरी सच्चाई बताई कि रेजांग लॉ में दुश्मन से मुकाबला करते हुए उन पांचों के अलावा उनकी टुकड़ी के सारे जवान शहीद हो गए हैं। आगे उन जवानों ने सीनियर ऑफिसर्स को यह भी बताया कि रेजांग ला पर उन्होंने और उनके साथी जवानों ने 1300 से ज्यादा चीनी सैनिकों को मार गिराया था। ऐसे में वहां मौजूद दो-तीन ऑफिसर्स को छोड़कर किसी को भी उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ और उन्हें यही लगा कि यह लोग झूठ बोल रहे हैं और युद्ध का मैदान छोड़कर भाग आए हैं। सिर्फ इतना ही नहीं इसके बाद उन्हें कोर्ट मार्शल की धमकी देते हुए उनके खिलाफ एक जांच कमेटी बनाई गई। अपनों से मिले अपमान ने जिंदा वापस लौटे जवानों का दिल तोड़ कर रख दिया। यहां तक कि समाज भी उन्हें शक की निगाहों से देखने लगा। किसी ने उन्हें भगोड़ा कहा तो किसी ने देशद्रोही इतना ही नहीं उनके बच्चों तक को स्कूलों से निकाल दिया गया। जहां इस बैटल से जिंदा बचे पांचों सैनिकों को बदनामी से गुजरना पड़ रहा था तो वहीं बाकी शहीद हुए सैनिकों की भी कोई खोज खबर नहीं ली गई और उनके पार्थिव शरीर करीब 3 महीने तक बर्फ पर यूं ही पड़े रहे। लड़ाई खत्म होने के बाद वहां भारी बर्फबारी हुई थी। जिस वजह से उस इलाके को नो मैनस लैंड घोषित कर दिया गया था और इसलिए वहां कोई लोकल भी नहीं जा पाया था। लेकिन युद्ध खत्म होने के करीब 3 महीने बाद फरवरी 1963 में एक गढ़रिया अपनी भेड़ों को चरातेचराते रास्ता भटक गया और एजांगला पहुंच गया। उसने यहां हाथों में राइफल और ग्रेनेड लिए कई भारतीय जवानों के शवों को देखकर तुरंत नजदीकी इंडियन आर्मी पोस्ट तक इसकी सूचना दी।8. कुछ दूर और चलने के बाद वहां उन्हें एक कुत्ता दिखाई दिया जो रेजांग ला में भारतीय सैनिकों की पोस्टिंग के दौरान वहां आया करता था। उस कुत्ते को देखकर निहाल सिंह को काफी हौसला मिला और उन्हें लगा कि यह कोई संकेत है। जब कुत्ते ने एक दिशा में चलना शुरू किया तो वह उसी को फॉलो करने लगे और आखिरकार नीचे मौजूद भारतीय बटालियन हेड क्वार्टर तक पहुंचने में कामयाब हो गए। निहाल सिंह आज भी मानते हैं कि उस कुत्ते के रूप में भगवान ने उनकी मदद करने के लिए किसी फरिश्ते को भेजा था। आगे रामचंद्र और उनके तीन साथी भी किसी तरह से चाइनीस सोल्जर्स के चंगुल से निकलकर बटालियन हेड क्वार्टर पहुंचने में सफल रहे। लेकिन दुर्भाग्य से एक सैनिक की चाइना के प्रिजन हाउस में ही मौत हो गई। 13 कुमाऊं के केवल 120 जवानों ने बर्फीली पहाड़ियों से ढके रेजांग ला के बैटल फील्ड में चाइनीस सैनिकों का इतनी बहादुरी से मुकाबला किया था कि उन्होंने चाइना की तरफ से आई करीब-करीब आधी टुकड़ी का सफाया कर दिया था। साथ ही चीन के सैकड़ों सैनिक बुरी तरह से घायल हो चुके थे। अगर भारत के उन 120 वीर जवानों के पास बेहतर राइफिलें, भरपूर गोला बारूद, बर्फ से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े और जरूरी आर्टिलरी सपोर्ट होता, तो यह बहादुर जवान ना जाने चीन की सेना का और कितना बुरा हश्र करते। जहां 1962 के इस इंडो चाइना वॉर में दूसरे मोर्चों पर चाइनीस सोल्जर्स एक आसान जीत हासिल कर रहे थे। वहीं रेजांग लॉ पर भारतीय जवानों ने उन्हें कई घंटों तक इंगेज करके ना केवल उनके बड़ी तादाद में सैनिकों को मार गिराया बल्कि उनके वॉर एमुनेशन के एक बड़े हिस्से को भी बुरी तरह से बर्बाद कर दिया था। इतनी बड़ी क्षति के बाद चाइनीस सोल्जर्स अपने मेन ऑब्जेक्टिव चुल की एस ट्रिप को कब्जाने की हिम्मत नहीं कर सके और जीत के बावजूद वो अपने मकसद में बिना कामयाब हुए पीछे की ओर लौट गए।

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