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0 Sourav Pradhan

 Battle of Rezang La11. उनके अंतिम दर्शन के लिए हजारों लोग सड़कों पर उमड़ पड़े। हर गली, हर नुक्कड़, हर छत पर खड़े होकर हजारों लोग उनकी अंतिम यात्रा को नम आंखों से देख रहे थे। आंखों में भले ही आंसू थे, लेकिन सभी का सीना गर्व से चौड़ा था क्योंकि वह अपने शूरवीर को अंतिम विदाई दे रहे थे। इसके बाद इंडियन गवर्नमेंट ने इन जवानों के बलिदान को स्वीकारते हुए मेजर शैतान सिंह को युद्ध क्षेत्र में अद्भुत पराक्रम दिखाने और उनके शानदार नेतृत्व के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया। इसके अलावा तीनों प्लेटून कमांडर्स नायब सूबेदार हरिराम, नायब सूबेदार सुरजाराम और कैप्टन रामचंद्र और उनके साथ नायक रामकुमार, नायक गुलाब सिंह, लैं्स नायक सिंह राम, नायक हुकुमचंद और नर्सिंग असिस्टेंट धर्मपाल भैया को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। साथ ही सीएचएम हरफूल सिंह, हवलदार जय नारायण, हवलदार फूल सिंह और सिपाही निहाल सिंह को सेना मेडल देकर सम्मानित किया गया। साथ ही 13 कुमाऊं रेजीमेंट को बैटल ऑनर रेजांग लॉ और थिएटर ऑनर लद्दाख जैसे प्रेस्टीजियस टाइटल से नवाजा गया। यहां तक कि चाइनीस आर्मी भी उनकी वीरता से इतनी प्रभावित हुई थी कि रेजांग लॉ से लौटते समय उन्होंने भारतीय जवानों के शवों के पास अपनी राइफलल्स उल्टी गाड़कर उन पर सम्मान के प्रतीक के रूप में अपनी टोपी रख दी थी। साल 1963 में ही इंडियन गवर्नमेंट ने त्रिशूल में रेजांग ला वॉर मेमोरियल बनवाया। जिन पर यहां शहीद हुए सभी 114 वीर जवानों के नाम अंकित है। यह स्मारक आज भी हर भारतीय को याद दिलाता है कि देश की मिट्टी को बचाने के लिए किन वीरों ने अपना लहू बहाया था। बैटल ऑफ एजांगला भारत और चीन के बीच 1962 में हुए वॉर का एक हिस्सा थी। और अगर आप 1962 इंडो चाइना वॉर की पूरी कहानी जानना चाहते हैं तो आप हमारी पिछली वीडियोस देख सकते हैं जिसका लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा। 10. इसके बाद 10 फरवरी 1963 को इंडियन आर्मी का एक जांच दल ब्रिगेडियर टीएन रायना के नेतृत्व में रेड क्रॉस के रिप्रेजेंटेटिव्स के साथ रेजांगला पहुंचा। बर्फ से ढकी उन पहाड़ियों में जहां कभी बंकर और मोर्चे थे, वहां अब सिर्फ वीरता की खामोश गवाही बची थी। चीनी गोलाबारी से तबाह हो चुके मोर्चों के पास बिखरे रेत के बोरे, गोलियों और बमों के टुकड़े और हर तरफ युद्ध की तबाही का मंजर था। कुछ सैनिकों के शव, गोलियों और छर्रों से छलनी होकर अब भी वहां वैसे के वैसे पड़े थे। उनके हाथों में अब भी उनकी राइफलें थी, ग्रेनेड थे जैसे मरते दम तक वह लड़ते रहे हो। नर्सिंग असिस्टेंट धर्मपाल दैया के हाथ में अब भी पट्टी और मॉर्फिन की सिरिंज थी। उन्होंने अपनी जान एक घायल साथी की जान बचाते हुए गवाई थी। किसी भी जवान की पीठ पर गोली नहीं लगी थी और हर एक ने सीने पर गोली खाई थी जिससे साफ पता चल रहा था कि उनमें से किसी ने भी भागने की कोशिश नहीं की थी। मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर अब भी एक बड़े पत्थर के सहारे वैसा ही टिका हुआ था जैसा उनके साथी कैप्टन रामचंद्र छोड़कर गए थे। उनके पैरों में अब भी रस्सियों से बंधी एलएमजी थी और उंगली ट्रिगर पर अब भी वैसी की वैसी जमी हुई थी। जब ब्रिगेडियर टीएन रैना ने यह सब अपनी आंखों से देखा तो वह अपने आंसू रोक नहीं सके। उन्हें और उनके साथ मौजूद जवानों को यह गिल्ट भी खाए जा रहा था कि उन्होंने क्यों 3 महीने तक अपने इन शहीद साथियों की तलाश नहीं की। 13 फरवरी तक 114 में से कुल 97 जवानों के शव मिल सके। कुछ जवानों के हाथों से उनके हथियार तक नहीं निकाले जा सके क्योंकि वह इतनी मजबूती से उन्हें थामे हुए थे कि उनकी उंगलियां काटनी पड़ी। 96 सैनिकों का वही अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया। ब्रिगेडियर टीएन रैना ने खुद अपने हाथों से इन सभी सैनिकों के शवों को सामूहिक चिता की अग्नि दी। इस मार्मिक दृश्य को देखकर वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आंखों में आंसू थे और वह उनकी वीरता को याद कर रहे थे। मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए उनके जोधपुर स्थित घर भेजा गया। भारतीय सेना के इतिहास में यह पहली बार हुआ था जब किसी शहीद का शरीर घर भेजा गया था। 

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