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0 Sourav Pradhan

 7. उन्होंने दुश्मन पर वार करते हुए अपनी सांस टूटने से पहले रामचंद्र से आखिरी बात कही। तुम मेरा यह कहना मान लो। फौरन अपनी पोस्ट पर लौट जाओ। अपने साथियों को बंदी होने से बचाओ और हो सके तो बटालियन हेड क्वार्टर्स जाकर सीईओ साहब को बताना कि हमारी कंपनी ने यह युद्ध किस बहादुरी के साथ लड़ा है। बस इतना कहकर सुबह के करीब 8:15 बजे मेजर शैतान सिंह अपनी आखिरी सांस तक लड़ते हुए शहीद हो गए। इसके बाद रामचंद्र फिर से मोर्चे पर लौटे और अपने बाकी साथियों के साथ मिलकर दुश्मन से लड़ने लगे। लेकिन चीनी सेना की भारी संख्या और उन्हें मिल रही हथियारों की सप्लाई के आगे वह और उनके बचे हुए साथी दुश्मन का ज्यादा देर तक सामना नहीं कर सके। अब तक मेजर शैतान सिंह समेत कुल 114 भारतीय सैनिक अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। अब मैदान में यहां केवल छह भारतीय सैनिक जिंदा थे। लेकिन अब तक वह भी बेहद गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। इसी के चलते जल्द ही कैप्टन रामचंद्र समेत सभी जिंदा बचे छह के छह जवानों को चीनी सैनिक बंदी बनाकर अपनी मिलिट्री पोस्ट में ले गए। इन छह जवानों में से निहाल सिंह सबसे ज्यादा होश में थे और उन्होंने तय किया कि वह दुश्मन के जंगुल से भाग निकलेंगे। बंदी बनाए जाने की अगली ही रात निहाल सिंह पहरे पर तैनात चीनी सिपाहियों को चकमा देकर वहां से भाग निकले। रात के अंधेरे में उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि भारतीय सीमा में दाखिल होने का रास्ता किस तरफ से है। लेकिन इसके बावजूद वो एक अनुमान पर एक ही दिशा में लगातार भागते रहे। कुछ देर बाद जब चाइनीस सोल्जर्स को उनके भागने का पता चला तो उन्होंने निहाल सिंह को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। दुश्मन की फायरिंग के वक्त वो उनसे केवल 500 मीटर की दूरी पर थे और ऐसे में उनकी जान हलक में आ गई। लेकिन उन्होंने भागना नहीं छोड़ा।8. कुछ दूर और चलने के बाद वहां उन्हें एक कुत्ता दिखाई दिया जो रेजांग ला में भारतीय सैनिकों की पोस्टिंग के दौरान वहां आया करता था। उस कुत्ते को देखकर निहाल सिंह को काफी हौसला मिला और उन्हें लगा कि यह कोई संकेत है। जब कुत्ते ने एक दिशा में चलना शुरू किया तो वह उसी को फॉलो करने लगे और आखिरकार नीचे मौजूद भारतीय बटालियन हेड क्वार्टर तक पहुंचने में कामयाब हो गए। निहाल सिंह आज भी मानते हैं कि उस कुत्ते के रूप में भगवान ने उनकी मदद करने के लिए किसी फरिश्ते को भेजा था। आगे रामचंद्र और उनके तीन साथी भी किसी तरह से चाइनीस सोल्जर्स के चंगुल से निकलकर बटालियन हेड क्वार्टर पहुंचने में सफल रहे। लेकिन दुर्भाग्य से एक सैनिक की चाइना के प्रिजन हाउस में ही मौत हो गई। 13 कुमाऊं के केवल 120 जवानों ने बर्फीली पहाड़ियों से ढके रेजांग ला के बैटल फील्ड में चाइनीस सैनिकों का इतनी बहादुरी से मुकाबला किया था कि उन्होंने चाइना की तरफ से आई करीब-करीब आधी टुकड़ी का सफाया कर दिया था। साथ ही चीन के सैकड़ों सैनिक बुरी तरह से घायल हो चुके थे। अगर भारत के उन 120 वीर जवानों के पास बेहतर राइफिलें, भरपूर गोला बारूद, बर्फ से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े और जरूरी आर्टिलरी सपोर्ट होता, तो यह बहादुर जवान ना जाने चीन की सेना का और कितना बुरा हश्र करते। जहां 1962 के इस इंडो चाइना वॉर में दूसरे मोर्चों पर चाइनीस सोल्जर्स एक आसान जीत हासिल कर रहे थे। वहीं रेजांग लॉ पर भारतीय जवानों ने उन्हें कई घंटों तक इंगेज करके ना केवल उनके बड़ी तादाद में सैनिकों को मार गिराया बल्कि उनके वॉर एमुनेशन के एक बड़े हिस्से को भी बुरी तरह से बर्बाद कर दिया था। इतनी बड़ी क्षति के बाद चाइनीस सोल्जर्स अपने मेन ऑब्जेक्टिव चुल की एस ट्रिप को कब्जाने की हिम्मत नहीं कर सके और जीत के बावजूद वो अपने मकसद में बिना कामयाब हुए पीछे की ओर लौट गए।

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